चंद्रशेखर वेंकटरमन हिंदी निबंध – CV Raman Biography

 उन्नीसवीं  शताब्दी का काल भारतीय इतिहास में विभिन्न क्षेत्रों में पुनं-जागरण काल माना जाएगा. यह एक ऐसा समय था जबकि देश में युग की आवश्यकतानुसार महान देशभक्‍तों, शिक्षा- विदों, इंजीनियरों व वैज्ञानिकों का उदय हुआ, जिन्होंने अपने परिश्रम, लगन व ज्ञान से देश की उन्नति की तथा अन्ततः हमारी मातृभूमि को स्वाधीनता प्राप्त हुई.

 इसी युग में एक महान भारतीय वैज्ञानिक ‘भारत रत्न’ श्री चंद्रशेखर वेंकटरमन का नाम आता है, जिन्होंने अपनी उत्कृष्ट विज्ञान साधना, अध्यवसाय, अदम्य उत्साह और लगन से विज्ञान के क्षेत्र में 28 फरवरी, 1928 को पमलपर्व गामन प्रभाव कर को अभूतपूर्व ‘रामन प्रभाव’ की ख़ोज की था अभी हाल में केन्द्रीय विज्ञान एवं टेक्नोलॉजी  मन्त्री श्री के. आर. नारायन ने इसी ऐतिहासिक खोज के कारण 28 फरवरी को “राष्ट्रीय विज्ञान दिवस” के रूप में मनाने की घोषणा की 

Dr Cv Raman

श्री चंद्रशेखर वेंकटरमन का जन्म 07 नवम्बर, 1888 को दक्षिण भारत के तिरुचिरापल्‍ली नगर में हुआ था. इनके पिता का नाम श्री चन्द्रशेखर अय्यर व माता का नाम पार्वती अम्माल था, जोकि संस्कृत व पांडित्य के परिवार से सम्बन्धित थीं. सन्‌ 1892 में इनके पिता की नियुक्ति भौतिक विज्ञान के प्राध्यापक पद पर विशाखापत्तनम में हो गई, जिससे रामन की प्रारम्भिक शिक्षा यहीं पर हुई. 1904 में प्रेसीडेंसी कालेज से बी.ए. व 1907 में एम.ए. प्रथम श्रेणी में उच्चतम सम्मान के साथ डिग्रियाँ प्राप्त की . 

1907 में ही भारतीय वित्त विभाग द्वारा आयोजित परीक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त कर कलकत्ता में सहायक महा लेखापाल के प्रद पर नियुक्त हुए. इतनी कम आयु में इतने उच्चतम पद पर नियुक्त होने का ब्रिटिश भारत में किसी भारतीय को यह पहला अवसर था. सरकारी नौकरी के दौरान उन्होंने अपनी विज्ञान साधना नहीं छोड़ी तथा कलकत्ता की भारतीय विज्ञान प्रचारिणी संस्था के संस्थापक डा, महेन्द्र लाल सरकार के सुपुत्र वैज्ञानिक सचिव डॉ अमृत लाल सरकार के साथ अपना वैज्ञानिक शोध कार्य करते रहे.

 1917 में कलकत्ता विश्वविद्यालय में भौतिक विज्ञान के प्राचार्य का पालित वाला पद बनने पर वहाँ नियुक्त हुए तथा सरकारी नौकरी से त्याग-पत्र दे दिया. उपकुलपति सर आशुतोष मुकर्जी ने साइन्स कालेज का उद्घाटन करते हुए कहा “श्री रामन ने विश्वविद्यालय की प्रोफेसरी स्वीकारं करके भारी वेतन वाली सरकारी नौकरी छोड़कर जिस अद्वितीय साहस और अपूर्व आत्म-त्याग का परिचय दिया है, उसकी यहाँ हार्दिक और वास्तविक प्रशंसा करना मेरा कर्त्तव्य है”

Chandrashekhar Venkatraman

ऐतिहासिक रामन प्रभाव-‘रामन प्रभाव’ डा. रामन की सर्वश्रेष्ठ वैज्ञानिक खोज माना जाता है. इसका सूत्रपात 1921 में रामन की विदेश यात्रा से ही शुरु हो गया था. समुद्र के गहरें नीले जल ने आपका ध्यान आकर्षित किया तथा पानी, हवा, बरफ आदि पारदर्शक माध्यमों के अणुओं द्वारा परिक्षिप्त होने वाले प्रकाश का आपने अध्ययन किया. इस सिद्धान्त के द्वारा उन्होंने बताया कि प्रकाश का रंग परिक्षेपण द्वारा बदल जातां है. प्रकाश प्रकीर्णन. के अध्ययन के स्वाभाविक परिणामस्वरूप 28 फरवरी, 1928 को एक नए रहस्य का उद्घाटन किया, जोकि ‘रामन प्रभाव’ के नाम से विख्यात है. इसी खौज के कारण श्री रामन को 1930 में भौतिक विज्ञान में नोबल पुरस्कार प्रदान किया गया तथा जिसके द्वारा असंख्य जटिल यौगिकों के अणु विन्यास के सुलझाने के अनगिनत लाभ हुए इसी ऐतिहासिक खोज के कारण 28 फरवरी को राष्ट्रीय विज्ञान दिवस के रूप में मनाया जायेगा.

1934 में श्री रामन ने बंगलौर में भारतीय विज्ञान अकादमी की स्थापना की तथा 1948 से नवस्थापित रामन अनुसन्धान संस्थान, बंगलौर में निदेशक पद पर आजीवन कार्य करते रहे. इस संस्थान के लिए उन्होंने अपनी समस्त अर्जित सम्पत्ति, शोध आदि दान में दे दिए. इस संस्थान में हीरों, खनिजों आदि का अभूतपूर्व व दुर्लभ संग्रह है. श्री रामन अन्तिम दिनों तक हीरों तथा अन्य रत्नों की बनावट के बारे में अनुसन्धान कार्य करते रहे.

इसके अतिरिक्त श्री रामन अत्यन्त सादगी, सहज व्यवहार व विनोदप्रिय थे. एक कुशल वक्‍ता तथा संगीत के अनन्य प्रेमी थे. उन्होंने संगीत वाद्यों की ध्वनि को मधुर बनाने के बारे में अपनी रिसर्च भी की. अल्प बीमारी के पश्चात श्री रामन का शनिवार दिन 21 नवम्बर, 1970 को 81 वर्ष की अवस्था में देहान्त हो गया उनकी दाह-क्रिया भी उसी संस्थान के प्रांगण में सम्पन्न हुई, जिसके लिए उन्होंने सारा जीवन अर्पण कर दिया.

मान-सम्मान

श्री रामन को देश-विदेश में सभी जगह सम्मान प्राप्त हुआ. 1924 में उन्हें रॉयल. सोसाइटी का फैलो चुना गया. 1929- में उन्हें ‘नाइट’ की पदवी से विभूषित किया गया. सोवियत रूस की संस्था ने अपने यहाँ का श्रेष्ठतम लेनिन शान्ति पुरस्कार प्रदान किया. इसके अतिरिक्त इटली की विज्ञान परिषद्‌ ने ‘मेटयूसी पदक’, अमरीका ने ‘फ्रेंकलिन पदक’ तथा इंगलैण्ड ने ‘ह्यूजेज पदक’ प्रदान किए हैं.

स्वाधीनता के पूर्व भारत हें अंग्रेज सरकार ने ‘सर’ की उपाधि प्रदान की तथा स्वतन्त्र भारत के प्रथम राष्ट्रपति ज्ञा, राजेन्द्र प्रसाद द्वारा 1984 में ‘भारत एत्न’ के उच्चतम राष्ट्रीय अलंकरण से अलकृत किया गया,

विश्वविख्यात वैज्ञानिक लार्ड रचरफोर्ड ने कहा, “वास्तव में आधार्य रामन ने कैक्ल महत्वपूर्ण अन्वेषण ही नहीं किए हैं, वरन्‌ अपने प्रयत्त से कलकत्ता विश्वविद्यालय में भौतिक विज्ञान के अन्वेषण के लिए एक प्रगतिशील और उद्योगी संस्था की स्थापना और विकास भी किया है.

राष्ट्रपति डा, राधाकृष्णन के अनुसार, डा, रामन एक महान शिक्षक हैं, उनका ज्ञान कग विज्ञान की विभिन्न शाखाओं तक ही सीमित नहीं है. आज के इस अति विशेषज्ञों के श्रेष्ठतम वैज्ञानिक हैं

भारतीय डाक-तार विभाग ने आधुनिक विश्व के वैज्ञानकि मानचित्र में भारत को स्थान दिलाने के लिए डाक टिकट जारी करके श्री रमन को सम्मान दिया.

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